पराली बस बहाना है, असली मकसद नाकामयाबी को छुपाना है…

दिल्ली की हवा जानलेवा स्तर पर प्रदूषित हो गई है. वायु प्रदूषण की भयानक स्थिति के कारण यहां सांस लेना एक दिन में 25 सिगरेट पीने के समान हो गया है. इस समस्या का किसी के पास कोई हल नहीं है. हां, हर बार कि तरह इस बार भी सभी स्कूलों को आनन-फानन में बद कर दिल्ली समेत एनसीआर में हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी गई है. खुद को जनता की हितैषी बताने के लिए सरकार स्कूलों में 50 लाख मास्क बंटवाकर तालियां बटोर रही है. केंद्र के पास समाधान नहीं है, इसलिए दिल्ली सरकार के नाम मात्र कोशिशों पर पानी फेरने के लिए ऑड-ईवन फॉर्मूले  का विरोध कर रही है.

इस पूरी समस्या पर क्या करना है या कैसे करना है का जवाब अभी किसी से देते नहीं बन रहा. लेकिन मीडिया, प्रशासन और सरकार तीनों के पास पराली को लेकर भरपूर ज्ञान है. हर साल की तरह इस साल भी शहर को गैस चैंबर बनाने के बाद सरकार के पास पराली का बहाना तैयार है. निसंदेह दिल्ली की प्रदूषित हवा में किसानों द्वारा जलाएं जा रहे पराली का योगदान भी है. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि सभी नाकामयाबियों को पराली की आड़ में छुपा दिया जाएं.

पराली के अलावा दिल्ली में ऐसे बहुत से कारक हैं जो यहां की हवा को भारी मात्रा में जहर बनाने का कार्य करते हैं. यहां की प्राइवेट गाड़ियां शहर में मौत का धुआं बांट रही है. पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण की माने तो 40 प्रतिशत तक का प्रदूषण तो मात्र यहां गाड़ियों की वजह से हो रहा है. पेट्रोल और डीजल से चलने वाली कारों की संख्या दिल्ली में बहुत बड़ी है. इसी तरह पूरे दिल्ली समेत एनसीआर में 3,182 बड़े इंडस्ट्रीज हैं, जो 18.6% प्रतिशत जहरीली हवा शहर की फिजाओं में घोलने का काम करते हैं.

1973 में बना बदरपुर थर्मल पावर स्टेशन का ही उदाहरण ले लीजिए. कोयले से चलने वाला ये पावर प्लांट  दिल्ली में वायु प्रदूषण का एक और प्रमुख स्रोत है. शहर की 8% से कम बिजली का उत्पादन करने के बावजूद, यह दिल्ली में इलेक्ट्रिक सेक्टर से 80 से 90% पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण पैदा करता है. यही कारण है कि 2017 के स्मॉग के दौरान इसे अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था. लेकिन 1 फरवरी 2018 को फिर से शुरू करने की अनुमति दी गई थी. इसी तरह के दर्जनों उद्योगों में पर्यावरण मानकों पर ध्यान देना कभी जरूरी नहीं समझा गया.

नौकरी या बेहतर व्यवसाय की संभावनाओं के कारण दिल्ली हमेशा से ही लोगों के आकर्षण का केंद्र रही है. 2012 के आंकड़ों के मुताबिक शहर की आबादी 1.9 करोड़ है, जिस कारण यहां के प्राकर्तिक संसाधनों का दोहन धड़ल्ले से हो रहा है. सतत पोषणीय विकास को अंगूठा दिखाते हुए यहां रियल स्टेट कंपनियां की चांदी हो रही है. इसी का एक और उदाहरण है कि दिल्ली गर्मियों में 300 एमजीडी पेय जल की कमी का सामना कर रही है. जिसका सीधा संबंध विकास की आड़ में पेड़-पौधों के समाप्त होने से है. हम किसानों पर दोष मढ़ सकते हैं, लेकिन क्या इस सत्य को मानने की हिम्मत कोई कर सकता है कि अपने-अपने व्यक्तिगत लाभ के कारण हम सभी ने दिल्ली को जहरीला बनाया है?

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