संकर किस्मों की बुवाई होने वाले से लाभ और उनकी भारतीय कृषि में उपयोगिता

भारत वर्ष एक कृषि प्रधान देश है. आज भी यहाँ की कुल आबादी का लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है, जिसका मुख्य व्यवसाय कृषि है. वर्तमान में निरन्तर प्रति व्यक्ति भूमि की उपलब्धता दिन प्रतिदिन घटती जा रही है तथा इसके विपरीत जनसंख्या दिन प्रतिदिन तेजी से बढ रही है. आज हमारे देश की जनसंख्या 125 करोड़ के पार पहुंच चुकी है. इतनी बड़ी जनसंख्या का पेट विभिन्न फसलों की परम्परागत किस्में  उगाकर भरना असम्भव है. अतः आज हमारे पास विभिन्न फसलों की संकर किस्मों को उगाकर ही देश की जनसंख्या की खाद्यान्न की पूर्ति की जा सकती है.

संकर किस्में  ही क्यों उगाये ?

भारतवर्ष में प्रतिव्यक्ति लगभग 0.30 हैक्टेयर भूमि की उपलब्धता है. आज भी किसान इस सीमित भूमि में विभिन्न फसलों की जैसे-गेहूँ, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, सरसों, गन्ना, दलहनी फसलों के साथ-साथ विभिन्न फल एवं सब्जियों की परम्परागत की बुवाई कर रहा है. हमारा किसान जागरूकता, रूढिवादिता तथा कम पढ़ा लिखा होने के कारण बीज का चुनाव, मृदा की तैयारी, उर्वरक प्रबंध, बीज शोधन, सिंचाई, निराई-गुड़ाई, फसलों और कीटों की रोकथाम इत्यादि का ठीक प्रकार एवं समय पर प्रबंध नहीं कर पाता है. जिसके कारण उसकी उपज में भारी गिरावट आती है और परिणाम-स्वरूप सभी फसलों की पैदावार सामान्य से कम होती है और किसान ऋण के बोझ के नीचे दबकर आत्म हत्या करने को मजबूर है. यही कारण है कि आज कृषि का जी0 डी0 पी0 में हिस्सा लगातार घट रहा है.

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. आज कृषि शिक्षा एवं शोध के क्षेत्र में अग्रसर देश की अग्रणी संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के आदेशानुसार विभिन्न शोध संस्थानों के द्वारा अनेक फसलों की संकर किस्मों का विकास किया जा चुका है. इनमे खाद्यान्न फसले जैसे-गेहूँ, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, दलहनी फसल जैसे-चना, अरहर, मसूर इत्यादि तथा अनेक तिलहनी फसल जैसे-सरसो, तिल, तोरिया इत्यादि. इसके अलावा अनेक फल तथा सब्जियों की किस्में , अनेक नकदी फसले जैसे-गन्ना, कपास, आदि मुख्य है. ये सभी फसलो की किस्में परम्परागत फसलों की क़िस्मों से कहीं अधिक उपज दे रही है. ये किस्में भूमि से पोषक तत्वों का अधिक प्रयोग करती है तथा परम्परागत फसलों की अपेक्षा पकने मे कम समय लगाती है.

भारत में फसल उत्पादन की वर्तमान स्थिति:-

भारत का धान तथा गेहूँ उत्पादन में विश्व में दूसरा, सरसों उत्पादन में तीसरा गन्ना उत्पादन में दूसरा, दहलन उत्पादन में पहला, तथा फल एवं सब्जी उत्पादन में दूसरा स्थान है. चीन खाद्यान्न फसलों, सब्जियों तथा फल उत्पाद में प्रथम स्थान पर है. इसका कारण यह है कि वह इन फसलों की संकर किस्में उगाता है.

संकर किस्मों से लाभ:-

भारत में कृषि योग्य भूमि लगभग 142.6 मिलियन हैक्टेयर है. आज जरूरत इस बात की है कि कुल कृषि योग्य भूमि में संकर तथा अधिक उपज होने वाली फसलों की बुवाई की जानी चाहिए. संकर किस्में  बुवाई के पश्चात तेजी से बढ़ती है तथा तेजी से बढकर फैल जाती है. इस प्रकार खरपतवार नहीं पनपते. संकर किस्मों में विभिन्न कीटो तथा बिमारियों का प्रकोप कम होता है. सभी फसलों की संकर किस्में  प्रायः अन्य फसलों की अपेक्षा 1.5 से 3.0 गुना अधिक पैदावार देती है. संकर किस्मो के बीज, फल, इत्यादि अधिक पोषक गुणवत्ता वाले होने के साथ-साथ आकर्षक रंग के होते है. संकर किस्मों पर वातावरण में परिवर्तन का बहुत ही कम प्रभाव पड़ता है.

इस प्रकार संकर किस्मों का प्रयोग करने से किसान की प्रति हैक्टेयर फसल उत्पादकता में वृद्धि होने के साथ-साथ किसानों की आर्थिक दशा में भी सुधार होगा. संकर किस्मों का अधिक मूल्य मिलने के कारण प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होने के साथ साथ कृषि उत्पादों के निर्यात में भी वृद्धि होगी और विदेशी मुद्रा प्राप्त होने से जी0डी0पी0 में कृषि की भागीदारी में बढोत्तरी होगी. जिसके परिणामस्वरूप देश की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा.

विभिन्न फसलों की संकर किस्में :

देश में अनेक फसलों की संकर किस्में विकसित की जा चुकी है. जैसे-धान में ए0पी0एच0आर0-1, ए0पी0एच0आर0-2, एम0जी0आर0-1, पूसारआर0एच0-10,

अरहर में आईसीपीएच-8, सूरजमुखी में बी0एस0एच0-1, कपास में एच-4, ज्वार में सी0एस0एच0-1 और 2, सरसो में पूसा जय किसान, बाजरा में एचबी-1, तम्बाकू में जीटीएच-1, आम में मल्लिका इत्यादि.

निष्कर्ष:

संकर किस्मों को लाईन से लाईन तथा पौधे की दूरी को मेनटेन किया जाता है. इससे बीज की बचत होती है. बोर्डकास्टिंग मैथड में अपेक्षाकृत अधिक बीज लगता है तथा कहीं पर बीज कम पडता है तथा कहीं अधिक, जबकि लाईन में बोने से समान मात्रा मंे बीज तथा उर्वरक पडता है. इससे खाद एवं उर्वरक की बचत होती है तथा जमाव शीघ्र तथा अच्छा होता है. अतः आज जरूरत किसान को इन विभिन्न संकर किस्मो के बारे में जागरूक करने की है. इस जागरूकता की शुरूआत किसान मेेले द्वारा, क्षेत्र प्रदर्शनी द्वारा, कृषि प्रसार के द्वारा, कृषि विश्वविद्यालयों एवं कृषि विभाग के द्वारा करने की जरूरत है. जिससे किसान किस्मों की उपयोगिता को समझ सके तथा उनका कल्याण हो सके.

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