फल-सब्जियों की खेती से करें हर महीने लाखों की कमाई

बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के दौर में आज के समय में फल और सब्जी के धंधे से लाखों कमाया जा सकता है। यदि वैज्ञानिकों के सलाह से जैविक खेती किया जाये तो यह मुनाफे का सौदा होगा। यमुनानगर (हरियाणा) के जिला उद्यान अधिकारी बताते हैं कि फल-फूल, सब्जियों की खेती को युवा आमदनी का अच्छा साधन बना रहे हैं। जिले में ऐसे तमा लोग बागवानी को बिजनेस की तरह सफल कर रहे हैं। 

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में केला, अमरूद, तरबूज और आलू के बाद अब दोआबा के किसान करेले की भी खेती करने लगे हैं। तीन से चार महीने की खेती में किसान प्रत्येक बीघे में 70-80 हजार रुपये की आमदनी कर ले रहे हैं। रोजगार की दृष्टि से इस गांव की तो कहानी ही अजब है। उदयपुर के महाराणा से इस गांव के लोगों को 52 हजार बीघा जमीन कभी मिली थी। मेनार गांव परदेसी पक्षियों के लिए भी प्रसिद्ध है। अब खेती-किसानी से जी चुराने का जमाना नहीं रहा। आज के युग में यह किसी चमत्कार से कम नहीं। आइटी सेक्टर और सरकार की अच्छी-अच्छी नौकरियां तक छोड़कर आजकल के युवा अपने गांवों की ओर लौटने लगे हैं। कोई अमरूद तो कोई केले की खेती, कोई मत्स्य पालन तो कोई फुलवारी से लाखों की कमाई करने लगा है। और तो और, यूपी के एक जिले में तो डायबिटीज के लिए कारगर करैले की खेती किसानों को मालामाल कर रही है। हालात देखकर लगता है कि किसानी अब घाटे का सौदा नहीं रह गई है। बस, जरा मेहनत, धैर्य और साहस के साथ खेती की वैज्ञानिक विधियों को आजमा लेने की जरूरत है। राजस्थान में उदयपुर के गांव मेनार के मांगीलाल हों या रामपुर के जुल्फिकार अली, वे कोई नौकरी छोड़कर तो अपनी किस्मत नहीं आजमा रहे, लेकिन खेती का ढर्रा बदल दिया है और चल पड़े हैं नए जमाने की दौड़ में शामिल होने के लिए। कमाई इतनी होने लगी है, कि आयकर दाता भी बन गए हैं। यमुनानगर (हरियाणा) के जिला उद्यान अधिकारी हीरा लाल बताते हैं कि फल-फूल, सब्जियों की खेती को युवा आमदनी का अच्छा साधन बना रहे हैं। जिले में ऐसे तमा लोग बागवानी को बिजनेस की तरह सफल कर रहे हैं। प्रोत्साहन के लिए उद्यान विभाग की ओर से अनुदान भी दिया जा रहा है। मशरूम उत्पादन में तो सोनीपत के बाद यमुनानगर दूसरे नंबर पर आ गया है। पुरुष किसानों के साथ महिलाएं भी मशरूम की खेती में मशगूल हैं। यमुनानगर में पैदा मशरूम की डिमांड दिल्ली तक है। पाली हाऊस में पैदा टमाटर और खीरे की भी काफी डिमांड है। अब ऐसा समय है अपनी फसल को मंडी तक ले जाने की जरूरत नहीं है। अब तो खरीददार खुद खेत में सब्जी लेने के लिए आने लगे हैं। मेनार (उदयपुर) के मांगीलाल सिंहावत अपनी 25 एकड़ की पैतृक जमीन में खेती कर हर महीने दो लाख रुपये कमा तो रहे ही हैं, सरकार को इनकम टैक्स भी दे रहे हैं। वह भी पहले आम किसानों की तरह खेती में मशक्कत कर खाली हाथ बने रहे लेकिन एक दिन अचानक राष्ट्रीय उद्यान मिशन की राह चल पड़े और खेत में अनार, अमरूद, नींबू की खेती करने लगे। अब उन्हें इन तीनो तरह के फलों से सालाना तेरह-चौदह लाख की कमाई होने लगी है। रोजगार की दृष्टि से इस गांव की तो कहानी ही अजब है। उदयपुर के महाराणा से इस गांव के लोगों को 52 हजार बीघा जमीन कभी मिली थी। मेनार गांव परदेसी पक्षियों के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां उन्हें देखने के लिए देशभर से पक्षी प्रेमियों का मेला जुटता है। इसी गांव के प्रभुलाल जोशी देशभर में टूर एंड ट्रेवल्स के अपने बिजनेस में यहां के करीब 400 से ज्यादा लोगों को रोजगार दिए हुए हैं। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में केला, अमरूद, तरबूज और आलू के बाद अब दोआबा के किसान करेले की भी खेती करने लगे हैं। तीन से चार महीने की खेती में किसान प्रत्येक बीघे में 70-80 हजार रुपये की आमदनी कर ले रहे हैं। डायबटीज और पेट संबंधी बीमारियों से राहत पाने के लिए यहां के करेले की मांग बाहर की मंडियों में बढ़ी है। यह खेती जून के अंतिम हफ्ते से जुलाई तक होती है। अगस्त और सितम्बर में करेला की तोड़ाई शुरू हो जाती है। कम समय में किसान एक-एक बीघे से कम से कम 12-12 हजार रुपये कमा ले रहे हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के ही रामपुर जिले की कहानी सामने आई है। जिले के काशीपुर, मुहम्मदपुर, लोहर्रा आदि गांवों में किसान बड़े पैमाने पर केले की खेती कर रहे हैं। किसान जगत सिंह का कहना है कि एक एकड़ केले की फसल में डेढ़ लाख रुपये तक मिल जा रहे हैं। केले की फसल को बेचने में भी परेशानी नहीं उठानी पड़ रही है। व्यापारी घर से ही खरीदकर ले जा रहे हैं। किसान जुल्फिकार अली का कहना है कि पहले गन्ने की फसल करते थे, जिसमें फायदा नहीं होता था। अब केले से अच्छा मुनाफा हो रहा है। 

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